हे (होतः) ज्ञान के यज्ञ के कर्त्तः ! जैसे (होता) शुभ गुणों का ग्रहण करनेवाला जन (तनूनपातम्) शरीरादि के रक्षक (उद्भिदम्) शरीर का भेदन कर निकलनेवाले (गर्भम्) गर्भ को जैसे (अदितिः) माता धारण करती, वैसे (यम्) जिस को (दधे) धारण करता है, (वयोधसम्) अवस्था के वर्धक (शुचिम्) पवित्र (इन्द्रम्) सूर्य्य को (यक्षत्) हवन का पदार्थ पहुँचाता है, (आज्यस्य) विज्ञानसम्बन्धी (उष्णिहम्) उष्णिक् छन्द से कहे हुए (छन्दः) बलकारी (इन्द्रियम्) जीव के श्रोत्रादि चिह्नों और (दित्यवाहम्) खण्डितों को पहुँचानेवाले (गाम्) वाणी और (वयः) सुन्दर-सुन्दर पक्षियों को (दधत्) धारण करता हुआ (वेतु) प्राप्त होवे, वैसे इन सब को आप (यज) सङ्गत कीजिये।
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