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यजुर्वेद • अध्याय 27 • श्लोक 34
तव॑ वायवृतस्पते॒ त्वष्टु॑र्जामातरद्भुत। अवा॒स्या वृ॑णीमहे ॥
हे (ऋतस्पते) सत्य के रक्षक (जामातः) जमाई के तुल्य वर्त्तमान (अद्भुत) आश्चर्यरूप कर्म करनेवाले (वायो) बहुत बलयुक्त विद्वन् ! हम लोग जो (त्वष्टुः) विद्या से प्रकाशित (तव) आप के (अवांसि) रक्षा आदि कर्मों का (आ, वृणीमहे) स्वीकार करते हैं, उन का आप भी स्वीकार करो ।
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