हे मनुष्यो ! तुम को उत्तम यत्न के साथ (इन्द्रस्य) बिजुली का (क्रोडः) डूबना (अदित्यै) पृथिवी के लिये (पाजस्यम्) अन्नों में जो उत्तम वह (दिशाम्) दिशाओं की (जत्रवः) सन्धि अर्थात् उनका एक-दूसरे से मिलना (अदित्यै) अखण्डित प्रकाश के लिये (भसत्) लपट ये सब पदार्थ जानने चाहियें तथा (जीमूतान्) मेघों को (हृदयौपशेन) जो हृदय में सोता है, उस जीव से (पुरीतता) हृदयस्थ नाड़ी से (अन्तरिक्षम्) हृदय के अवकाश को (उदर्येण) उदर में होते हुए व्यवहार से (नभः) जल और (चक्रवाकौ) चकई-चकवा पक्षियों के समान जो पदार्थ उन को (मतस्नाभ्याम्) गले के दोनों ओर के भागों से (दिवम्) प्रकाश को (वृक्काभ्याम्) जिन क्रियाओं से अवगुणों का त्याग होता है, उनसे (गिरीन्) पर्वतों को (प्लाशिभिः) उत्तम भोजन आदि क्रियाओं से (उपलान्) दूसरे प्रकार के मेघों को (प्लीह्ना) हृदयस्थ प्लीहा अङ्ग से (वल्मीकान्) मार्गों को (क्लोमभिः) गीलेपन और (ग्लौभिः) हर्ष तथा ग्लानियों से (गुल्मान्) दाहिनी ओर उदर में स्थित जो पदार्थ उनको (हिराभिः) बढ़तियों से (स्रवन्तीः) नदियों को (ह्रदान्) छोटे-बड़े जलाशयों को (कुक्षिभ्याम्) कोखों से (समुद्रम्) अच्छे प्रकार जहाँ जल जाता उस समुद्र को (उदरेण) पेट और (भस्मना) जले हुए पदार्थ का जो शेषभाग उस राख से (वैश्वानरम्) सब के प्रकाश करने हारे अग्नि को तुम लोग जानो
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