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यजुर्वेद • अध्याय 25 • श्लोक 48
तक्षकवासुकिकुलजाः कामगमा ये च पन्नगास्तेषाम् । स्निग्धा नीलद्युतयो भवन्ति मुक्ताः फणस्यान्ते ॥
जो तक्षक और वासुकि के कुल में उत्पन्न स्वेच्छाचारी सर्प होते हैं, उनके फणों के अग्र भाग में स्निग्ध एवं नीली कान्ति वाले मोती उत्पन्न होते हैं।
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