हे मनुष्यो ! तुम को (अग्नेः) अग्नि की (पक्षतिः) सब ओर से ग्रहण करने योग्य व्यवहार की मूल (वायोः) पवन की (निपक्षतिः) निश्चित विषय का मूल (इन्द्रस्य) सूर्य की (तृतीया) तीन को पूरा करनेवाली क्रिया (सोमस्य) चन्द्रमा की (चतुर्थी) चार को पूरा करनेवाली (अदित्यै) अन्तरिक्ष की (पञ्चमी) पाँचवीं (इन्द्राण्यै) स्त्री के समान वर्त्तमान जो बिजुलीरूप अग्नि की लपट उसकी (षष्ठी) छठी (मरुताम्) पवनों की (सप्तमी) सातवीं (बृहस्पतेः) बड़ों की पालना करनेवाले महत्तत्त्व की (अष्टमी) आठवीं (अर्यम्णः) स्वामी जनों का सत्कार करनेवाले की (नवमी) नवीं (धातुः) धारण करने हारे की (दशमी) दशमी (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान् की (एकादशी) ग्यारहवीं (वरुणस्य) श्रेष्ठ पुरुष की (द्वादशी) बारहवीं और (यमस्य) न्यायाधीश राजा की (त्रयोदशी) तेरहवीं क्रिया करनी चाहिये
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