हे (अश्विना) पढ़ाने और पढ़ने हारे सज्जनो ! (धिष्ण्या) भूमि के समान धारण करनेवाले (युवम्) तुम दोनों हम लोगों ने जो पढ़ा है, उस को (शृणुतम्) सुनो। जैसे (नः) हम लोगों के लिये (वातः) पवन (तत्) उस (मयोभु) सुख करने हारी (भेषजम्) ओषधि की (वातु) प्राप्ति करे (तत्) उस ओषधि को (माता) मान्य देनेवाली (पृथिवी) विस्तारयुक्त भूमि तथा (तत्) उस को (पिता) पालना का हेतु (द्यौः) सूर्यमण्डल प्राप्त करे तथा (तत्) उस को (सोमसुतः) ओषधि और ऐश्वर्य को उत्पन्न करने और (मयोभुवः) सुख की भावना कराने हारे (ग्रावाणः) मेघ प्राप्त करें (तत्) यह सब व्यवहार तुम्हारे लिये भी होवे।
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