हे (प्रजापते) सब प्रजा के रक्षक स्वामिन् ईश्वर ! कोई भी (त्वत्) आप से (अन्यः) भिन्न (ता) उन (एतानि) इन पृथिव्यादि भूतों तथा (विश्वा) सब (रूपाणि) स्वरूपयुक्त वस्तुओं पर (न) नहीं (परि, बभूव) बलवान् है, (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले होकर (वयम्) हम लोग आप की (जुहुमः) प्रशंसा करें (तत्) वह-वह कामना के योग्य वस्तु (नः) हम को (अस्तु) प्राप्त हो, (ते) आपकी कृपा से हम लोग (रयीणम्) विद्या, सुवर्ण आदि धनों के (पतयः) रक्षक स्वामी (स्याम) होवें।
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