हे मनुष्यो ! जैसे शिक्षा करनेवाले सज्जन (काम्या) मनोहर (हरी) ले जाने हारे (विपक्षसा) जो कि विविध प्रकारों से भलीभाँति ग्रहण किये हुए (शोणा) लाल-लाल रंग से युक्त (धृष्णू) अतिपुष्ट (नृवाहसा) मनुष्यों को एक देश से दूसरे देश को पहुँचाने हारे दो घोड़ों को (रथे) में (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, वैसे योगीजन (अस्य) इस परमेश्वर के बीच इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और प्राणों को युक्त करते हैं।
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