हे (अङ्ग) मित्र ! (कुवित्) बहुत विज्ञानयुक्त तू (इहेह) इस-इस व्यवहार में (एषाम्) इन मनुष्यों से (यथा) जैसे (यवमन्तः) बहुत जौ आदि अन्नयुक्त खेती करनेवाले (यवम्) जौ आदि अनाज के समूह को बुस आदि से (वियूय) पृथक्कर (चित्) और (अनुपूर्वम्) क्रम से (दान्ति) छेदन करते हैं, उनके और (ये) जो (बर्हिषः) जल वा (नमउक्तिम्) अन्नसम्बन्धी वचन को (यजन्ति) कहकर सत्कार करते हैं, उनके (भोजनानि) भोजनों को (कृणुहि) करो
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