हे राजन् ! जैसे मैं (दधिक्राव्णः) जो धारण-पोषण करनेवालों को प्राप्त होता (वाजिनः) बहुत वेगयुक्त (जिष्णोः) जीतने और (अश्वस्य) शीघ्र जानेवाला है, उस घोड़े के समान पराक्रम को (अकारिषम्) करूँ, वैसे आप (नः) हम लोगों के (सुरभि) सुगन्धियुक्त (मुखा) मुखों के तुल्य पराक्रम को (प्र, करत्) भलीभाँति करो और (नः) हमारे (आयूंषि) आयुओं को (तारिषत्) उनकी अवधि के पार पहुँचाओ।
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