हे विद्याबोध चाहनेवाले पुरुष ! (यस्मिन्) जिस देखने योग्य लोक में (सः) वह (अग्निः) अग्नि (पशुः) देखने योग्य (आसीत्) है, (तेन) उससे जिस प्रकार यज्ञ करनेवाले (अयजन्त) यज्ञ करें, उस प्रकार से तू यज्ञ कर। जैसे (सः) वह विद्वान् (एतम्) इस (लोकम्) देखने योग्य स्थान को (अजयत्) जीतता है, वैसे इसको जीत, यदि (तम्) उसको (जेष्यसि) जीतेगा तो वह (अग्निः) अग्नि (ते) तेरा (लोकः) देखने योग्य (भविष्यति) होगा, इससे तू (एताः) इन यज्ञ से शुद्ध किये हुए (अपः) जलों को (पिब) पी। (यस्मिन्) जिसमें (सः) वह (वायुः) पवन (पशुः) देखने योग्य (आसीत्) है और जिससे यज्ञ करनेवाले (अयजन्त) यज्ञ करें (तेन) उससे तू यज्ञ कर। जैसे (सः) वह विद्वान् (एतम्) इस वायुमण्डल के रहने के (लोकम्) लोक को (अजयत्) जीते, वैसे तू जीत, जो (तम्) उसको (जेष्यसि) जीतेगा तो वह (वायुः) पवन (ते) तेरा (लोकः) देखने योग्य (भविष्यति) होगा। इससे तू (एताः) इन (अपः) यज्ञ से शुद्ध किये हुए प्राण रूपी पवनों को (पिब) धारण कर (यस्मिन्) जिसमें वह (सूर्य्यः) सूर्य्यमण्डल (पशुः) देखने योग्य (आसीत्) है, (तेन) उससे (अयजन्त) यज्ञ करनेवाले यज्ञ करें, जैसे (सः) वह विद्वान् (एतम्) इस सूर्य्यमण्डल के ठहरने के (लोकम्) लोक को (अजयत्) जीतता है, वैसे तू जीत। जो तू (तम्) उसको (जेष्यसि) जीतेगा तो (सः) वह (सूर्यः) सूर्य्यमण्डल (ते) तेरा (लोकः) देखने योग्य (भविष्यति) होगा, इससे तू (एताः) यज्ञ से शुद्धि किये हुए (अपः) संसार में व्याप्त हो रहे सूर्यप्रकाशों को (पिब) ग्रहण कर।
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