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यजुर्वेद • अध्याय 23 • श्लोक 15
स्व॒यं वा॑जिँस्त॒न्वं᳖ कल्पयस्व स्व॒यं य॑जस्व स्व॒यं जु॑षस्व। म॒हि॒मा ते॒ऽन्येन॒ न स॒न्नशे॑ ॥
हे (वाजिन्) बोध चाहनेवाले जन ! तू (स्वयम्) आप (तन्वम्) अपने शरीर को (कल्पयस्व) समर्थ कर (स्वयम्) आप अच्छे विद्वानों को (यजस्व) मिल और (स्वयम्) आप उनकी (जुषस्व) सेवा कर, जिससे (ते) तेरी (महिमा) बड़ाई तेरा प्रताप (अन्येन) और के साथ (न) मत (सन्नशे) नष्ट हो।
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