हे मनुष्यो ! जो (भूतस्य) उत्पन्न कार्यरूप जगत् के (अग्रे) पहिले (हिरण्यगर्भः) सूर्य, चन्द्र, तारे आदि ज्योति गर्भरूप जिसके भीतर हैं, वह सूर्य आदि कारणरूप पदार्थों में गर्भ के समान व्यापक स्तुति करने योग्य (समवर्त्तत) अच्छे प्रकार वर्त्तमान और इस सब जगत् का (एकः) एक ही (जातः) प्रसिद्ध (पतिः) पालना करनेहारा (आसीत्) होता है (सः) वह (इमाम्) इस (पृथिवीम्) विस्तारयुक्त पृथिवी (उत) और (द्याम्) सूर्य आदि लोकों को रचके इनको (दाधार) तीनों काल में धारण करता है, उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सुख देनेहारे परमात्मा के लिये जैसे हम लोग (हविषा) सर्वस्व दान करके उस की (विधेम) परिचर्या सेवा करें, वैसे तुम भी किया करो।
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