हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (सुमतीवृधः) जो उत्तम मति को बढ़ाता (सवितुः) सब को उत्पन्न करता, उस ईश्वर की (सुष्टुतिम्) सुन्दर स्तुति कर इससे (मतीविदे) जो ज्ञान को प्राप्त होता है, उस (देवाय) विद्या आदि गुणों की कामना करनेवाले मनुष्य के लिये (रातिम्) देने को (प्रेमहे) भलीभाँति माँगते हैं, वैसे इस देने की क्रिया को इस ईश्वर से तुम लोग भी माँगो
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