हे मनुष्यो ! जैसे मैं (स्वस्तये) सुख के लिए (अस्रवन्तीम्) छिद्रादि दोष वा (अनागसम्) बनावट के दोषों से रहित (शतारित्राम्) अनेकों लङ्गरवाली (सुनावम्) अच्छे बनी नाव पर (आ, रुहेयम्) चढ़ूँ, वैसे इस पर तुम भी चढ़ो।
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