यऽइन्द्र॑ऽइन्द्रि॒यं द॒धुः स॑वि॒ता वरु॑णो॒ भगः॑। स सु॒त्रामा॑ ह॒विष्प॑ति॒र्यज॑मानाय सश्चत ॥
हे विद्वन् ! (ये) जो लोग (इन्द्रे) ऐश्वर्य्य में (इन्द्रियम्) धन को (दधुः) धारण करें, वे सुखी होवें। इस कारण जो (भगः) सेवा करने के योग्य (वरुणः) श्रेष्ठ (सविता) ऐश्वर्य की इच्छा से युक्त (सुत्रामा) अच्छे प्रकार रक्षक (हविष्पतिः) होम करने योग्य पदार्थों की रक्षा करेनहारा मनुष्य (यजमानाय) यज्ञ करनेहारे के लिये धन को (सश्चत) सेवे, (सः) वह प्रतिष्ठा को प्राप्त होवे।
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