हे विद्वन् ! जिससे तू (मे) मेरे (प्राणपाः) प्राण का रक्षक (अपानपाः) अपान का रक्षक (मे) मेरे (चक्षुष्पाः) नेत्रों का रक्षक (श्रोत्रपाः) श्रोत्रों का रक्षक (च) और (मे) मेरी (वाचः) वाणी का (विश्वभेषजः) सम्पूर्ण ओषधिरूप (मनसः) विज्ञान का सिद्ध करनेहारे मन का (विलायकः) विविध प्रकार से सम्बन्ध करनेवाला (असि) है, इस से तू हमारे पिता के समान सत्कार करने योग्य है।
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