हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्वान् ! जो (पयस्वान्) प्रशंसित जल की विद्या से युक्त मैं तुझ को (आ, अगमम्) प्राप्त होऊँ वा (अद्य) आज (रसेन) मधुरादि रस से युक्त (अपः) जलों को (अन्वचारिषम्) अनुकूलता से पान करूँ, (तम्) उस (मा) मुझको (वर्चसा) साङ्गोपाङ्ग वेदाध्ययन (प्रजया) प्रजा (च) और (धनेन) धन से (च) भी (सम्, सृज) सम्यक् संयुक्त कर, जिससे ये लोग और मैं सब हम सुख के लिये (समसृक्ष्महि) संयुक्त होवें।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
यजुर्वेद के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
यजुर्वेद के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।