हे (बर्हिषदः) उत्तम सभा में बैठनेहारे (पितरः) न्याय से पालना करनेवाले पितर लोगो ! हम (अर्वाक्) पश्चात् जिन (वः) तुम्हारे लिये (ऊती) रक्षणादि क्रिया से (इमा) इन (हव्या) भोजन के योग्य पदार्थों का (चकृम) संस्कार करते हैं, उन का तुम लोग (जुषध्वम्) सेवन किया करो। वे आप लोग (शन्तमेन) अत्यन्त कल्याणकारक (अवसा) रक्षणादि कर्म के साथ (आ, गत) आवें। (अथ) इसके अनन्तर (नः) हमारे लिये (शम्) सुख तथा (अरपः) सत्याचरण को (दधात) धारण करें और दुःख को (योः) हम से पृथक् रक्खें ।
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