हे मनुष्यो ! (इह) इस संसार में (इन्द्रियाय) धन और इन्द्रियबल के लिये (यम्) जिस (नमुचेः) जल को जो नहीं छोड़ता (आसुरात्) उस मेघ-व्यवहार से (अधि) अधिक (शुक्रम्) शीघ्र बलकारी (मधुमन्तम्) उत्तम मधुरादिगुणयुक्त (इन्दुम्) परमैश्वर्य्य करनेहारे (राजानम्) प्रकाशमान (सोमम्) पुरुषार्थ में प्रेरक सोम ओषधि को (सरस्वती) विदुषी स्त्री (असुनोत्) सिद्ध करती तथा (अश्विना) सभा और सेना के पति सिद्ध करते हैं, (तम्, इमम्) उस इस को मैं (भक्षयामि) भोग करता और भोगवाता हूँ।
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