आ श्रा॑व॒येति॑ स्तो॒त्रियाः॑ प्रत्याश्रा॒वोऽअनु॑रूपः। यजेति॑ धाय्यारू॒पं प्र॑गा॒था ये॑यजाम॒हाः ॥
हे विद्वन् ! तू विद्यार्थियों को विद्या (आ, श्रावय) सब प्रकार से सुना, जो (स्तोत्रियाः) स्तुति करने योग्य हैं, उनको (प्रत्याश्रावः) पीछे सुनाया जाता है और (अनुरूपः) अनुकूल जैसा यज्ञ है, वैसे (येयजामहाः) जो यज्ञ करते हैं (इति) इस प्रकार अर्थात् उन के समान (प्रगाथाः) जो अच्छे प्रकार गान किये जाते हैं, उनको (यजेति) सङ्गत कर, इस प्रकार (धाय्यारूपम्) धारण करने योग्य रूप को यथावत् जानें।
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