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यजुर्वेद • अध्याय 18 • श्लोक 60
ए॒तं जा॑नाथ पर॒मे व्यो॑म॒न् देवाः॑ सधस्था वि॒द रू॒पम॑स्य। यदा॑गच्छा॑त् प॒थिभि॑र्देव॒यानै॑रिष्टापू॒र्त्ते कृ॑णवाथा॒विर॑स्मै ॥
हे (सधस्थाः) एक साथ स्थानवाले (देवाः) विद्वानो ! तुम (परमे) परम उत्तम (व्योमन्) आकाश में व्याप्त (एतम्) इस परमात्मा को (जानाथ) जानो और (अस्य) इसके व्यापक (रूपम्) सत्य चैतन्यमात्र आनन्दमय स्वरूप को (विद) जानो, (यत्) जिस सच्चिदानन्द-लक्षण परमेश्वर को (देवयानैः) धार्मिक विद्वानों के (पथिभिः) मार्गों से पुरुष (आगच्छात्) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे, (अस्मै) इस परमेश्वर के लिये (इष्टापूर्त्ते) वेदोक्त यज्ञादि कर्म और उसके साधक स्मार्त्त कर्म को (आविः) प्रकाशित (कृणवाथ) किया करो।
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