हे विद्वन् ! जो आप (विश्वस्य) सब संसार के (मूर्द्धन्) शिर पर (श्रितः) विराजमान सूर्य के समान (अधि, तिष्ठसि) अधिकार पाये हुए हैं, जिन (ते) आपका (समुद्रे) अन्तरिक्ष के तुल्य व्यापक परमेश्वर में (हृदयम्) मन (अप्सु) प्राणों में (आयुः) जीवन है, उन (अपः) प्राणों को (दत्त) देते हो, (उदधिम्) समुद्र का (भिन्त) भेदन करते हो, जिससे सूर्य (दिवः) प्रकाश (अन्तरिक्षात्) आकाश (पर्जन्यात्) मेघ और (पृथिव्याः) भूमि से (वृष्ट्या) वर्षा के योग से सब चराचर प्राणियों की रक्षा करता है, (ततः) इससे अर्थात् सूर्य के तुल्य (नः) हम लोगों की (अव) रक्षा करो।
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