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यजुर्वेद • अध्याय 18 • श्लोक 37
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्रस॑वे᳕ऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। सर॑स्वत्यै वा॒चो य॒न्तुर्य॒न्त्रेणा॒ग्नेः साम्रा॑ज्येना॒भिषि॑ञ्चामि ॥
हे विद्वन् राजन् ! जैसे मैं (त्वा) आप को (सवितुः) सकल ऐश्वर्य की प्राप्ति करानेहारा जो (देवस्य) आप ही प्रकाश को प्राप्त परमेश्वर उसके (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए जगत् में (अश्विनोः) सूर्य और चन्द्रमा के प्रताप और शीतलपन के समान (बाहुभ्याम्) भुजाओं से (पूष्णः) पुष्टि करनेवाले प्राण के धारण और खींचने के समान (हस्ताभ्याम्) हाथों से (सरस्वत्यै) विज्ञानवाली (वाचः) वाणी के (यन्तुः) नियम करनेवाले (अग्नेः) बिजुली आदि अग्नि की (यन्त्रेण) कारीगरी से उत्पन्न किये हुए (साम्राज्येन) सब भूमि के राजपन से (अभिषिञ्चामि) अभिषेक करता हूँ, वैसे आप सुख से मेरा अभिषेक करें
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