हे विद्वान् ! तू (पृथिव्याम्) पृथिवी पर जिस (पयः) जल वा दुग्ध आदि के रस (ओषधीषु) ओषधियों में जिस (पयः) रस (दिवि) शुद्ध निर्मल प्रकाश वा (अन्तरिक्षे) सूर्य और पृथिवी के बीच में जिस (पयः) रस को (धाः) धारण करता है, उस सब (पयः) जल वा दुग्ध के रस को मैं भी धारण करूँ, जो (प्रदिशः) दिशा-विदिशा (पयस्वतीः) बहुत रसवाली तेरे लिये (सन्तु) हों, वे (मह्यम्) मेरे लिये भी हों
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