हे (अग्ने) रसविद्या के जाननेहारे विद्वन् ! जो मैं (पृथिव्याः) पृथिवी के (पयसा) रस के साथ (मा) अपने को (संसृजामि) मिलाता हूँ वा (अद्भिः) अच्छे शुद्ध जल और (ओषधीभिः) सोमलता आदि ओषधियों के साथ (मा) अपने को (संसृजामि) मिलाता हूँ, (सः) सो (अहम्) मैं (वाजम्) अन्न का (सनेयम्) सेवन करूँ, इसी प्रकार तू आचरण कर
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