हे मनुष्य ! तेरे प्रजाजनों के स्वामी होने के लिये (आयुः) जिससे जीवन होता है, वह आयुर्दा (यज्ञेन) परमेश्वर और अच्छे महात्माओं के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हो, (प्राणः) जीवन का हेतु प्राणवायु (यज्ञेन) सङ्ग करने से (कल्पताम्) समर्थ होवे, (चक्षुः) नेत्र (यज्ञेन) परमेश्वर वा विद्वान् के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हों, (श्रोत्रम्) कान (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हों, (वाक्) वाणी (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हों (मनः) संकल्पविकल्प करनेवाला मन (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार (कल्पताम्) समर्थ हो, (आत्मा) जो कि शरीर इन्द्रिय तथा प्राण आदि पवनों को व्याप्त होता है, वह आत्मा (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार (कल्पताम्) समर्थ हो, (ब्रह्मा) चारों वेदों का जाननेवाला विद्वान् (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हो, (ज्योतिः) न्याय का प्रकाश (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हो, (स्वः) सुख (यज्ञेन) ईश्वर वा विद्वान् के सत्कार से (कल्पताम्) समर्थ हो, (पृष्ठम्) जानने की इच्छा (यज्ञेन) पठनरूप यज्ञ से (कल्पताम्) समर्थ हो, (यज्ञः) पाने योग्य धर्म (यज्ञेन) सत्यव्यवहार से (कल्पताम्) समर्थ हो, (स्तोमः) जिसमें स्तुति होती है, वह अथर्ववेद (च) और (यजुः) जिससे जीव सत्कार आदि करता है, वह यजुर्वेद (च) और (ऋक्) स्तुति का साधक ऋग्वेद (च) और (साम) सामवेद (च) और (बृहत्) अत्यन्त बड़ा वस्तु (च) और सामवेद का (रथन्तरम्) रथन्तर नामवाला स्तोत्र (च) भी ईश्वर वा विद्वा्न के सत्कार से समर्थ हो। हे (देवाः) विद्वानो ! जैसे हम लोग (अमृताः) जन्म-मरण के दुःख से रहित हुए (स्वः) मोक्षसुख को (अगन्म) प्राप्त हों तथा (प्रजापतेः) समस्त संसार के स्वामी जगदीश्वर की (प्रजाः) पालने योग्य प्रजा (अभूम) हों तथा (वेट्) उत्तम क्रिया और (स्वाहा) सत्यवाणी से युक्त (अभूम) हों, वैसे तुम भी होओ
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