वि॒त्तं च॑ मे॒ वेद्यं॑ च मे भू॒तं च॑ मे भवि॒ष्यच्च॑ मे सु॒गं च॑ मे सुप॒थ्यं᳖ च मऽऋ॒द्धं च॑ म॒ऽऋद्धि॑श्च म क्लृ॒प्तं च॑ मे॒ क्लृप्ति॑श्च मे मति॒श्च मे सुम॒तिश्च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥
(मे) मेरा (वित्तम्) विचारा हुआ विषय (च) और विचार (मे) मेरा (वेद्यम्) विचारने योग्य विषय (च) और विचारनेवाला (मे) मेरा (भूतम्) व्यतीत हुआ विषय (च) और वर्त्तमान (मे) मेरा (भविष्यत्) होनेवाला (च) और सब समय का उत्तम व्यवहार (मे) मेरा (सुगम्) सुगम मार्ग (च) और उचित कर्म (मे) मेरा (सुपथ्यम्) सुगम युक्ताहार-विहार का होना (च) और सब कामों में प्रथम कारण (मे) मेरा (ऋद्धम्) अच्छी वृद्धि को प्राप्त पदार्थ (च) और सिद्धि (मे) मेरी (ऋद्धिः) योग से पाई हुई अच्छी वृद्धि (च) और तुष्टि अर्थात् सन्तोष (मे) मेरा (क्लृप्तम्) सामर्थ्य को प्राप्त हुआ काम (च) और कल्पना (मे) मेरी (क्लृप्तिः) सामर्थ्य की कल्पना (च) और तर्क (मे) मेरा (मतिः) विचार (च) और पदार्थ-पदार्थ का विचार करना (मे) मेरी (सुमतिः) उत्तम बुद्धि तथा (च) अच्छी निष्ठा ये सब (यज्ञेन) शम, दम आदि नियमों से युक्त योगाभ्यास से (कल्पन्ताम्) समर्थ हों
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