हे (अग्ने) विद्वन् ! (देवयताम्) कामना करते हुए जनों के बीच तू (प्रथमः) पहिले (प्रेहि) प्राप्त हो जिससे (देवानाम्) विद्वान् (उत) और (मर्त्यानाम्) अविद्वानों का तू (चक्षुः) व्यवहार देखनेवाला है, जिससे (इयक्षमाणाः) यज्ञ की इच्छा करने (सजोषाः) एक-सी प्रीतियुक्त (यजमानाः) सबको सुख देनेहारे जन (भृगुभिः) परिपूर्ण विज्ञानवाले विद्वानों के साथ (स्वस्ति) सामान्य सुख और (स्वः) अत्यन्त सुख को (यन्तु) प्राप्त हों, वैसा तू भी हो
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