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यजुर्वेद • अध्याय 17 • श्लोक 5
हि॒मस्य॑ त्वा ज॒रायु॒णाग्ने॒ परि॑व्ययामसि। पा॒व॒कोऽअ॒स्मभ्य॑ꣳ शि॒वो भ॑व ॥
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् सभापते ! हम लोग (हिमस्य) शीतल को (जरायुणा) जीर्ण करनेवाले वस्त्र वा अग्नि से (त्वा) आपको (परि, व्ययामसि) सब प्रकार आच्छादित करते हैं, वैसे (पावकः) पवित्रस्वरूप आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (शिवः) मङ्गलमय (भव) हूजिये
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