(यत्र) जिस संग्राम में (विशिखा इव) विना चोटी के वा बहुत चोटियोंवाले (कुमाराः) बालकों के समान (बाणाः) बाण आदि शस्त्र अस्त्रों के समूह (संपतन्ति) अच्छे प्रकार गिरते हैं, (तत्) वहाँ (बृहस्पतिः) बड़ी सभा वा सेना का पालनेवाला (इन्द्रः) सेनापति (शर्म) आश्रय वा सुख के (यच्छतु) देवे और (अदितिः) नित्य सभासदों से शोभायमान सभा (विश्वाहा) सब दिन (नः) हम लोगों के लिये (शर्म) सुख सिद्ध करनेवाले घर को (यच्छतु) देवे
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