सेना के पुरुष अपने स्वामी से ऐसे कहें कि हे (वृत्रहन्) मेघ को सूर्य के समान शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करनेवाले (मघवन्) प्रशंसित धनयुक्त सेनापति ! आप (मामकानाम्) हम लोगों के (सत्वनाम्) सेनास्थ वीर पुरुषों के (आयुधानि) जिनसे अच्छे प्रकार युद्ध करते हैं, उन शस्त्रों का (उद्धर्षय) उत्कर्ष कीजिए। हमारे सेनास्थ जनों के (मनांसि) मनों को (उत्) उत्तम हर्षयुक्त कीजिए। हमारे (वाजिनाम्) घोड़ों की (वाजिनानि) शीघ्र चालों को (उत्) बढ़ाइये तथा आपकी कृपा से हमारे (जयताम्) विजय करानेवाले (रथानाम्) रथों के (घोषाः) शब्द (उद्यन्तु) उठें
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