हे मनुष्यो ! तुम जिससे उत्पन्न हुए (अहोरात्रे) दिन और रात्रि (अधिपत्नी) सब काम कराने के अधिकारी (आस्ताम्) हैं, जिस ने (शूद्रार्य्यौ) शूद्र और आर्य्य द्विज ये दोनों (असृज्येताम्) रचे हैं, उस की (नवदशभिः) दश प्राण, पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारों से (अस्तुवत) स्तुति करो। जिसने उत्पन्न किया (वरुणः) जल (अधिपतिः) प्राण के समान प्रिय अधिष्ठाता (आसीत्) है, जिस ने (एकशफाः) जुड़े एक खुरोंवाले घोड़े आदि (पशवः) पशु (असृज्यन्त) रचे हैं, उस की (एकविंशत्या) मनुष्यों के इक्कीस अवयवों से (अस्तुवत) स्तुति करो, जिसने बनाया (पूषा) पुष्टिकारक भूगोल (अधिपतिः) रक्षा करनेवाला (आसीत्) है, जिस ने (क्षुद्राः) अतिसूक्ष्म जीवों से लेकर नकुल पर्य्यन्त (पशवः) पशु (असृज्यन्त) रचे हैं, उस की (त्रयोविंशत्या) पशुओं के तेईस अवयवों से (अस्तुवत) स्तुति करो। जिसने बनाया हुआ (वायुः) वायु (अधिपतिः) पालने हारा (आसीत्) है, जिसने (आरण्याः) वन के (पशवः) सिंह आदि पशु (असृज्यन्त) रचे हैं, (पञ्चविंशत्या) अनेकों प्रकार के छोटे-छोटे वन्य पशुओं के अवयवों के साथ अर्थात् उन अवयवों की कारीगरी के साथ (अस्तुवत) प्रशंसा करो, जिसने बनाये (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि (व्यैताम्) प्राप्त हैं, जिस के बनाने से (वसवः) अग्नि आदि आठ पदार्थ वा प्रथम कक्षा के विद्वान् (रुद्राः) प्राण आदि वा मध्यम विद्वान् (आदित्याः) बारह महीने वा उत्तम विद्वान् (अनुव्यायन्) अनुकूलता से उत्पन्न हैं, (ते) (एव) वे अग्नि आदि ही वा विद्वान् लोग (अधिपतयः) अधिष्ठाता (आसन्) होते हैं, उस की (सप्तविंशत्या) सत्ताईस वन के पशुओं के गुणों से (अस्तुवत) स्तुति करो
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