हे मनुष्य ! जो तू (यवानाम्) मिले हुए पदार्थों का (भागः) सेवन करने हारा शरद् ऋतु के समान (असि) है, जो (अयवानाम्) पृथक्-पृथक् धर्मवाले पदार्थों के (आधिपत्यम्) अधिकार को प्राप्त होकर प्रीति से (प्रजाः) पालने योग्य प्रजाओं को (स्पृताः) प्रेमयुक्त करता है, जो (चतुश्चत्वारिंशः) चवालीस संख्या का पूर्ण करनेवाला (स्तोमः) स्तुति के योग्य (ऋभूणाम्) बुद्धिमानों के (भागः) सेवने योग्य (असि) है, (विश्वेषाम्) सब (देवानाम्) विद्वानों के (भूतम्) हो चुके (स्पृतम्) सेवन किये हुए (आधिपत्यम्) अधिकार को प्राप्त होकर जो (त्रयस्त्रिंशः) तेंतीस संख्या का पूरक (स्तोमः) स्तुति के विषय के समान (असि) है, सो तू हम लोगों से सत्कार के योग्य है
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