हे (इन्द्राग्नी) बिजुली और सूर्य्य के समान वर्त्तमान स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (अव्यथमानाम्) जमी हुई बुद्धि को प्राप्त होके (इष्टकाम्) र्इंट के समान गृहाश्रम को (दृंहतम्) दृढ़ करो। जैसे (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि (पृष्ठेन) पीठ से (अन्तरिक्षम्) आकाश को बाँधते हैं, वैसे तुम दुःख (च) और शत्रुओं को बाँधा करो। हे पुरुष ! जैसे तू इस अपनी स्त्री की पीड़ा को (विबाधसे) विशेष करके हटाता है, वैसे यह स्त्री भी तेरी सकल पीड़ा को हरा करे
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