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यजुर्वेद • अध्याय 11 • श्लोक 26
परि॑ त्वाग्ने॒ पुरं॑ व॒यं विप्र॑ꣳ सहस्य धीमहि। धृ॒षद्व॑र्णं दि॒वेदि॑वे ह॒न्तारं॑ भङ्गु॒राव॑ताम् ॥
हे (सहस्य) अपने बल को चाहनेवाले (अग्ने) अग्निवत् विद्या से प्रकाशमान विद्वान् पुरुष ! जैसे (वयम्) हम लोग (दिवेदिवे) प्रतिदिन (भङ्गुरावताम्) खोटे स्वभाववालों के (पुरम्) नगर को अग्नि के समान (हन्तारम्) मारने (धृषद्वर्णम्) दृढ़ सुन्दर वर्ण से युक्त (विप्रम्) विद्वान् (त्वा) आपको (परि) सब प्रकार से (धीमहि) धारण करें, वैसे तू हम को धारण कर
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