हे सभापति राजपुरुष ! जिस लिये आप (वाचः) वेदवाणी के (अनिभृष्टम्) भृष्टतारहित आचरण के लिये (बन्धुः) भाई (असि) हैं, (सोमस्य) ओषधियों के काटनेवाले (तपोजाः) ब्रह्मचर्य्यादि तप से प्रसिद्ध (असि) हैं, आप की आज्ञा से (सवितुः) सब जगत् को उत्पन्न करनेहारे ईश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न हुए जगत् में (वैष्णव्यौ) सब विद्या, अच्छी शिक्षा, शुभ गुण, कर्म और स्वभाव में व्यापनशील और (पवित्रे) शुद्ध आचरणवाली (स्थः) तुम दोनों हो। हे पढ़ाने, परीक्षा करने और पढ़नेहारी स्त्री लोगो ! मैं (सवितुः) ईश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये इस जगत् में (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की (रश्मिभिः) किरणों के समान (अच्छिद्रेण) छेदरहित (पवित्रेण) विद्या, अच्छी शिक्षा, धर्मज्ञान, जितेन्द्रियता और ब्रह्मचर्य्य आदि करके पवित्र किये हुए से (वः) तुम लोगों को (उत्पुनामि) अच्छे प्रकार पवित्र करता हूँ, तुम लोग (स्वाहा) सत्य क्रिया से (राजस्वः) राजाओं में वीरों को उत्पन्न करनेवाली हो
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