हे राजपुरुषो ! तुम लोग (सूर्य्यत्वचसः) सूर्य के समान अपने न्याय प्रकाश से सब तेज को ढाँकनेवाले होते हुए (स्वाहा) सत्य न्याय के साथ (राष्ट्रदाः) राज्य देनेहारे (स्थ) हो, इसलिये (मे) मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। हे मनुष्यो ! जिस कारण (सूर्यत्वचसः) सूर्य्यप्रकाश के समान विद्या पढ़नेवाले होते हुए तुम लोग (राष्ट्रदाः) राज्य देनेहारे (स्थ) हो, इसलिये (अमुष्मै) उस विद्या में सूर्यवत् प्रकाशमान पुरुष के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। हे विद्वन् मनुष्यो ! (सूर्यवर्चसः) सूर्य के समान तेजधारी होते हुए तुम लोग (स्वाहा) सत्य वाणी से (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हो, इस कारण (मे) तेजस्वी मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये, जिस कारण (सूर्यवर्चसः) सूर्य्य के समान प्रकाशमान होते हुए आप लोग (राष्ट्रदाः) राज्य देनेहारे (स्थ) हो, इसलिये (अमुष्मै) उस प्रकाशमान पुरुष के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण (मान्दाः) मनुष्यों को आनन्द देनेहारे होते हुए आप लोग (स्वाहा) सत्य वचनों के साथ (राष्ट्रदाः) राज्य देनेवाले (स्थ) हो, इसलिये (मे) आनन्द देनेहारे मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये, जिसलिये आप लोग (मान्दाः) प्राणियों को सुख देनेवाले होके (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हो, इसलिये (अमुष्मै) उस सुखदाता जन को (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप लोग (व्रजक्षितः) गौ आदि पशुओं के स्थानों को बसाते हुए (स्वाहा) सत्य क्रियाओं के सहित (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इसलिये (मे) पशुरक्षक मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप लोग (व्रजक्षितः) स्थान आदि से पशुओं के रक्षक होते हुए (राष्ट्रदाः) राज्य देनेहारे (स्थ) हैं, इससे (अमुष्मै) उस गौ आदि पशुओं के रक्षक पुरुष के लिये राज्य को (दत्त) दीजिये। जिसलिये आप लोग (वाशाः) कामना करते हुए (स्वाहा) सत्यनीति से (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इसलिये (मे) इच्छायुक्त मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप लोग (वाशाः) इच्छायुक्त होते हए (राष्ट्रदाः) राज्य देनेवाले (स्थ) हैं, इसलिये (अमुष्मै) उस इच्छायुक्त पुरुष के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप लोग (शविष्ठाः) अत्यन्त बलवाले होते हुए (स्वाहा) सत्य पुरुषार्थ से (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इस कारण (मे) बलवान् मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप लोग (शविष्ठाः) अति पराक्रमी (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इस कारण (अमुष्मै) उस अति पराक्रमी जन के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। हे राणी लोगो ! जिसलिये आप (शक्वरीः) सामर्थ्यवाली होती हुई (स्वाहा) सत्य पुरुषार्थ से (राष्ट्रदाः) राज्य देने हारी (स्थ) हैं, इसलिये (मे) सामर्थ्यवान् मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप (शक्वरीः) सामर्थ्ययुक्त (राष्ट्रदाः) राज्य देनेवाली (स्थ) हैं, इस कारण (अमुष्मै) उस सामर्थ्ययुक्त पुरुष के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिसलिये आप लोग (जनभृतः) श्रेष्ठ मनुष्यों का पोषण करने हारी होती हुई (स्वाहा) सत्य कर्मों के साथ (राष्ट्रदाः) राज्य देनेवाली (स्थ) हैं, इसलिये (मे) श्रेष्ठ गुणयुक्त मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिसलिये आप (जनभृतः) सज्जनों को धारण करनेहारे (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इसलिये (अमुष्मै) उस सत्यप्रिय पुरुष के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। हे सभाध्यक्षादि राजपुरुषो ! जिसलिये आप लोग (विश्वभृतः) सब संसार का पोषण करनेवाले होते हुए (स्वाहा) सत्य वाणी के साथ (राष्ट्रदाः) राज्य देनेहारे (स्थ) हैं, इसलिये (मे) सब के पोषक मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिसलिये आप लोग (विश्वभृतः) विश्व को धारण करनेहारे (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इसलिये (अमुष्मै) उस धारण करनेहारे मनुष्य के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिस कारण आप लोग (आपः) सब विद्या और धर्म विषय में व्याप्तिवाले होते हुए (स्वाहा) सत्य क्रिया से (राष्ट्रदाः) राज्य देनेहारे (स्थ) हैं, इस कारण (मे) शुभ गुणों में व्याप्त मुझे (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। जिसलिये आप लोग (आपः) सब विद्या और धर्म मार्ग को जाननेहारे (स्वराजः) आप से आप ही प्रकाशमान (राष्ट्रदाः) राज्यदाता (स्थ) हैं, इसलिये (अमुष्मै) उस धर्मज्ञ पुरुष के लिये (राष्ट्रम्) राज्य को (दत्त) दीजिये। हे सज्जन स्त्री लोगो ! आप को चाहिये कि (क्षत्रियाय) राजपूतों के लिये (महि) बड़े पूजा के योग्य (क्षत्रम्) क्षत्रियों के राज्य को (वन्वानाः) चाहती हुई (सहौजसः) बल-पराक्रम के सहित वर्त्तमान (क्षत्रियाय) राजपूतों के लिये (महि) बड़े (क्षत्रम्) राज्य को (दधतीः) धारण करती हुई (अनाधृष्टाः) शत्रुओं के वश में न आनेवाली (मधुमतीः) मधुर आदि रसवाली ओषधी (मधुमतीभिः) मधुरादि गुणयुक्त वसन्त आदि ऋतुओं से सुखों को (पृच्यन्ताम्) सिद्ध किया करें। हे सज्जन पुरुषो ! तुम लोग इस प्रकार की स्त्रियों को (सीदत) प्राप्त होओ
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