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यजुर्वेद • अध्याय 10 • श्लोक 27
निष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या᳕स्वा। साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑ ॥
हे राणी ! जैसे आपका (धृतव्रतः) सत्य का आचरण और ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का धारण करनेहारा (सुक्रतुः) सुन्दर बुद्धि वा क्रिया से युक्त (वरुणः) उत्तमपति (साम्राज्याय) चक्रवर्त्ती राज्य होने और उसके काम करने के लिये (पस्त्यासु) न्यायघरों में (आ) निरन्तर (नि) नित्य ही (ससाद) बैठ के न्याय करे, वैसे तू भी न्यायकारिणी हो
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