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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 7
परस्त्रीपुरपराङ्मुखास्त्रिदण्डं कमण्डलुं भुक्तपात्रं जलपवित्रं शिखां यज्ञोपवीतं बहिरन्तश्चेत्येतत्सर्वं भूः स्वाहेत्यप्सु परित्ययात्मानमन्विच्छेत्॥
संन्यासी को चाहिए कि वह दूसरों की स्त्रियों को न देखता हुआ तथा नगर में न रहता हुआ, त्रिदण्ड, कमण्डलु, भुक्तपात्र (भोजन पात्र), जल पवित्र, शिखा, यज्ञोपवीत आदि सभी बाह्य एवं आन्तरिक प्रतीक चिह्नो को ‘भूः स्वाहा’ कहकर जल में विसर्जित करता हुआ निरन्तर आत्मा का अनुसंधान करता रहे।
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