संन्यासी को चाहिए कि वह दूसरों की स्त्रियों को न देखता हुआ तथा नगर में न रहता हुआ, त्रिदण्ड, कमण्डलु, भुक्तपात्र (भोजन पात्र), जल पवित्र, शिखा, यज्ञोपवीत आदि सभी बाह्य एवं आन्तरिक प्रतीक चिह्नो को ‘भूः स्वाहा’ कहकर जल में विसर्जित करता हुआ निरन्तर आत्मा का अनुसंधान करता रहे।
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