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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 5
अथ वा परिव्राइविवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षमाणो ब्रह्मभूयाय भवति । एष पन्थाः परिव्राजकानां चीराध्वाने चाऽनाशके वापां प्रवेशे वाग्निप्रवेशे वा महाप्रस्थाने वा। एष पन्था बहाणा हानुवित्तस्तेनेति स संन्यासी ब्रह्मविदिति । एवमेवैष भगवन्निति वै याज्ञवल्क्य ॥
इस प्रकार गेरुवे वस्त्र धारण करने वाला संन्यासी मुण्डनयुक्त, अपरिग्रही, पवित्रतायुक्त, किसी से द्रोह (ईर्ष्या-द्वेष) न करने वाला, भिक्षाचरण करता हुआ ब्रह्मपद को प्राप्त होता है, वह ब्रह्मस्वरूप है अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति के लिए समर्थ है। संन्यासियों के लिए यही मार्ग है - यही विधि है। जल प्रवेश, अग्नि प्रवेश, वीरगति, महाप्रस्थान(मृत्युमोक्ष) आदि में परिव्राजकों (संन्यासियों) के लिए यह रास्ता निर्दिष्ट किया है। इसी कारण से संन्यासी ब्रह्म का ज्ञाता (जानकार) होता है। यह विधि ऐसी ही है महाराज; ऐसा याज्ञवल्क्य जी ने कहा।
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