अथ हैनमत्रि: पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं अयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मण इति ।
स होवाच याज्ञवल्क्य इदं प्रणवमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं य आत्मा।
प्राश्याचम्यायं विधिः ॥
इसके पश्चात् याज्ञवल्क्य जी से अत्रि ऋषि ने पूछा— ‘हे महर्षे! यज्ञोपवीत के बिना कोई ब्राह्मण कैसे रह सकता है?
याज्ञवल्क्य ऋषि ने कहा— यह ॐकार ही उस संन्यासी को यज्ञोपवीत है, यही आत्मा है। जो पूर्वोक्त प्रकार से हवन करके उसका प्राशन कर आचमन कर लेता है।
उसके लिए मात्र यही विधि है।
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