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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 33
यतीनां तदुपादेयं पारहंस्यं परं पदम्। नातः परतरं किंचिद्विद्यते मुनिपुङ्गव इत्युपनिषत् ॥
हे मुनि श्रेष्ठ! परमहंस का परम श्रेष्ठ पद मोक्ष ही यतियों के लिए उपादेय (अर्थात् आवश्यक वस्तु) है। इससे बढ़कर और कुछ भी नहीं है। यही सर्वोत्कृष्ट है। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई।
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