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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 32
चिदिहास्तीति चिन्मात्रमिदं चिन्मयमेव च। चित्त्वं चिदहमेते च लोकाश्चिदिति भावय ॥
यति को यही भावना करनी चाहिए कि मैं इस संसार में चित्स्वरूप ही हूँ। अखण्ड ब्रह्माण्ड चिन्मय है तथा सभी कुछ चिद्रूप ही है। मैं भी चिद् ही हूँ एवं सम्पूर्ण सृष्टि चिद्रूप ही है।
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