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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 30
नमोऽस्तु मम कोपाय स्वाश्रयज्वालिने भृशम्। कोपस्य मम वैराग्यदायिने दोषबोधिने ॥
अपने स्वयं के आधार को ही भस्म कर देने वाले क्रोध के लिए मेरा बारम्बार नमस्कार है। मुझे वैराग्य प्रदान करने वाले एवं दोषों का बोध कराने वाले कोप को बारम्बार नमन-वंदन है।
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