ग्राम (गाँव) से अग्नि को लाकर पूर्व की भॉति ही उसका आघ्राण करे। यदि अग्नि न मिल सके, तो जल में ही यजन कृत्य सम्पन्न करे; क्योंकि जल को सर्वदेवमय कहा गया है। मैं सभी देवों के प्रति हवन करता हूँ ‘स्वाहा’ यह आहुति उन्हें प्राप्त हो। इस प्रकार हवन करके उसका प्राशन करे अर्थात् उसे खा ले। यह रोगनाशक घृतयुक्त हवि है। मोक्ष मंत्रों के द्वारा इस तरह से वेदत्रयी को प्राप्ति करे। वह ही ब्रह्म है, उसकी उपासना करनी चाहिए। चोटी एवं यज्ञोपवीत का परित्याग करके ‘मैंने संन्यास ग्रहण कर लिया है’, इस प्रकार से इसका तीन बार उच्चारण करे। हे विदेहराज जनक जी! यह विधि ऐसी ही है, ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा।
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