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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 29
अपकारिणि कोपश्चेत्कोपे कोपः कथं न ते। धर्मार्थकाममोक्षाणां प्रसह्य परिपन्थिनि ।।
क्रोध करने वाले आदमी से पूछना चाहिए कि क्रोध पर ही तुम क्रोध क्यों नहीं करते हो; जो समस्त वस्तुओं का मूल कारण है। साथ ही जो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का बलवान् बैरी है।
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