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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 28
रिपौ बद्धे स्वदेहे च समैकात्म्यं प्रपश्यतः। विवेकिनः कुतः कोपः स्वदेहावयवेष्विव ॥
शत्रु एवं सांसारिक बन्धनों से युक्त शरीर में जो एक भाव से देखने वाला ज्ञानशील यति होता है, उसे किसी पर भी क्रोध नहीं आता। जिस प्रकार कि व्यक्ति को अपने हाथ-पैर आदि अंगों पर क्रोध नहीं आता।
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