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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 26
यूंनश्च परदारादि दारिद्रयं च कुटुम्बिनः। पुत्रदुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्मियते तदा ॥
इसके अतिरिक्त जवान लड़के का ‘पर नारी से बुरा सम्पर्क न हो जाये’ आदि भय बना रहता है या फिर यदि विवाह हो जाये, तो बालकों की इतनी संख्या हो जाती है कि परिवार का भरण-पोषण भी कठिन हो जाता है। इस तरह से पुत्र से होने वाले दुःखों की कोई गणना नहीं। इसके अलावा यह भी देखने में आता है कि सेठ लोगों के बच्चे ही नहीं होते और यदि होते भी हैं, तो मर जाते हैं आदि-आदि। (अतः इन समस्त दुःखों की कारण-भूत स्त्री का परित्याग कर देना चाहिए या विवाह ही न करे)।
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