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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 23
यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा नि:स्त्रीकस्य कृ भोगभूः। स्त्रियं त्यक्त्वा जगत्यक्तं जगत्त्यक्त्वा सुखी भवेत्॥
जिसके पास स्त्री है, उसी के पास भोग की इच्छा है तथा जिसके पास स्त्री ही नहीं, वह कहाँ किसके साथ भोगे? यदि कोई मनुष्य स्त्री का त्याग कर दे, तो यह समझना चाहिए कि उसने संसार को ही छोड़ दिया। संसार छोड़ देने पर तो प्रत्येक व्यक्ति सुखी हो ही जाता है।
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